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रविवार, 16 अगस्त 2020

Solve your problem

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 सब समस्यों का एक  हल 


कई बार जब हमारा दोस्त परेशानी में होता है और वह जब हमसे सलाह मांगता है तो हम उसको ज्यादा सही सलाह दे पाते हैं लेकिन जब वैसा ही हमारे  साथ होता है तो हमारे ऊपर वह समस्या इतनी हावी रहती है कि  हम खुदके लिए सही निर्णय नहीं ले पाते। यहां अब यह सवाल उठता है कि है ऐसा हम जान बूझ के करते हैं या उसके कुछ कारण हैं -

आईये मिल कर खोजते हैं-

पहला हमारा डर- जैसे मेरा कोई व्यापार है और उसमें कई समस्याएं हैं- अब पहला डर ये है कि वो खत्म हो सकता है लेकिन अगर हम डरेंगे तो वो वेसे भी खत्म हो जायेगा।




अब हम खोजने जाते हैं किसी ऐसे को जो हमारी समस्या का समाधान कर दे- सलाह में कुछ गलत नहीं है लेकिन हम प्रैक्टिकल रूप से अगर अपने आप को उस समस्या से अलग नहीं करेंगे- तब तक समस्या का वास्तविकता में हल नहीं होगा क्योंकि यहाँ हमें यह देखना पड़ेगा कि अगर यह समस्या हल हो गई तो क्या हमारी सारी समस्याएं हल हो जायेंगीं इसके लिए आप देखते जायें कि जो सक्सेसफुल हैं क्या उनकी सभी समस्याएँ हल हो गई हैं। जब आप  अपने आप को इस प्रकार देखेंगे तो यह देख पायेंगे कि समस्या का हल हो या न हो, उससे आपकी जींदगी पर कोई विशेष रूप से फर्क नहीं पड़ेगा। अब क्योंकि आपकी समस्या से आपका डर खत्म हो जायेगा तब आप उसे इस तरह और उस तरह देख पायेंगे और बायस होकर गलत निर्णय करने से बच जायेगें क्योंकि अन्ततः  आपके लिए क्या सही है वह आप ज्यादा सही से जान सकते हैं। 

यह तो रही किसी एक समस्या पर निर्णय लेने की बात, लेकिन क्या कोई ऐसा तरीक़ा है कि हमारी सारी समस्याएं एक साथ हल हो जायें- 



हाँ  -: यहाँ आप यह समझें कि जब तक जीवन रहेगा समस्याएं भी रहेंगी। वास्तविक समस्या कोई समस्या के आने में नहीं वरन् समस्या नहीं आये इस विचार में है जब हम वास्तविकता में यह बात गहराई से समझ जायेंगे तो एक तो कोई भी समस्या आएगी तो पेनिक नहीं होँगे और दुसरा उसके समाधान को ज्यादा अच्छे से खोज पायेंगे। जेसे आज जो अपना करियर को एक समस्या के रूप में देखते हैं और बेहद परेशान रहते हैं जब वो उन लोगों को देखेंगे जिनका करियर बन चुका है- तो वो लोग ये कहेंगे कि वो दिन अच्छे थे- भाग दौड की जिन्दगी थी लेकिन फिर भी आज से बढिया समय था यानी हमेशा हमें दुसरी साईड में ही ज्यादा खुशियाँ दिखाई देती हैं , इस तरह की नहीं तो उस तरह की यानि शेप चेंज होती रहती है पर उलझन , परेशानी आती रहती है जैसे आप लम्बी ड्राइव पर निकलें और उसमें न ट्रैफिक हो और न गड्ढे तो आपको नींद आने लगेगी यानी बाहर से नहीं तो अंदर से कुछ न कुछ चलता रहता है इसलिए ये देखो कि बहुत से लोगों के लिए-जो जीवन हम जी रहे हैं, वह जीवन उनका ख्वाब है- जिसके बच्चे नहीं वो बच्चों के लिए परेशान और जिसके बच्चे हैं वो उनसे परेशान। इसलिए खुशी या समस्या का हल बाहर है ही नहीं। कैसी भी परिस्तिथि में  हम ऊपर वाले का धन्यवाद देते रहें , संतुष्ट रहें । यकीन मानिये कुछ भी हो जाए आप हमेशा बहुत सारे लोगों से ऊपर ही रहेंगे इसलिए खुश रहेँ। contentment is only the way.

 · बिनु संतोष न काम नसाहीं। काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं।

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books are suggested-

1- Contentment: A Godly Woman's Adornment

2- Becoming A Woman Whose God Is Enough

मंगलवार, 11 अगस्त 2020

गोविंदा और आनन्दा

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गोविंदा और आनन्दा 🙏

कई लोग कहते हैं कि कृष्ण तो अलौकिक थे पर वे जितने अलौकिक थे उतने ही लौकिक भी थे - वो ऐसे बेटे थे कि आज भी हर माँ अपने बेटे में कान्हा को देखती है , मित्र थे तो ऐसे कि हर कोई इनकी मित्रता का उदाहरण देता है , प्रेमी थे तो ऐसे कि हर कोई अपने दिल में कान्हा को बसाता है , पति , राजा , रक्षक हर रूप में वो परम लौकिक थे और भक्तों के लिए तो आज भी वही प्राण आधार हैं।  


ब्रिज के कण - कण में आज भी वही दिखता है , हमारी झोली ( सामर्थ ) जितनी है उतना ही हम जान पाते हैं।  जिसका स्वरूप ही आनन्द से बना हो उसके गान को कोन गा सकता है -

सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे! तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नमः। 

सच्चिदानंद स्वरूप भगवान् श्री कृष्ण को हम नमस्कार करते हैं , जो इस जगत की उत्पत्ति , स्थिति और विनाश के हेतु तथा आध्यात्मिक , आधिदैविक और आधिभौतिक - तीनों प्रकार के तापों का नाश करनें वाले हैं!

कृष्ण अपने नाम के अनुरूप - कर्षयति इति कृष्णः - जो आकर्षित करे वह कृष्ण।  

भगवान श्रीकृष्ण का जीवन  १६ कलाओं से पूर्ण हैं । इस बात को कृष्ण की बाल लीलाओं से भी हम समझ सकते हैं । बाल्यकाल में सबसे पहला कार्य गायों को वन में ले जाने का है। वहाँ उनके साथ हर स्तर के गोपबाल जोते हैं । सब अपनी अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार दोपहर की भोजन लाते हैं ।बालकृष्ण  बड़े  सहज हैं । भोजन करते समय खेल खेल में सबके  भोजन  को मिलाकर स्वयं अपने हाथों से सबको खिलाकर सहज ही ऊंच-नीच का भेद मिटा समरसता को जगा देते हैं । मटकी फोड़, माखन चोर का खेल भी केवल नटखट लीला नहीं  है। वह भी एक बड़ी क्रांति  है। यह नन्दग्राम व गोकुल के परिश्रम से उत्पन्न दूघ-दही  को कंस के राक्षसों के पोषण के लिये जाने से रोकने का सहज तरीका है। सबसे पहला स्वदेशी आंदोलन।

पूतना, शकटासुर तथा बकासुर जैसे असूरों का नाश व नृत्य कर  कालिया मर्दन से कई दशकों से पीड़ित और शोषित लोगों के मध्य आत्मविश्वास आत्मबल को पैदा किया।

कहाँ तो वृन्दावन , कहाँ द्वारका , कहाँ कुरुक्षेत्र - उनका पूरा जीवन - पूर्ण कर्म की शिक्षा देता है साथ ही पूर्ण निर्लिप्तता इसीलिए उन्हें योगेश्वर कृष्ण कहा गया।  

कर्म , भक्ति और ज्ञान के जो रास्ते उन्होंने गीता में बताये वह भी मेरे विचार से व्यक्ति को निर्भार करने के ही रास्ते हैं।  हम इसे ऐसे समझ सकते हैं कि हम पैदल निकले , हमारे साथ हमारा सामान भी था जो कि हमने अपने सिर पर रखा हुआ है  - अब रास्ते में हमारा मित्र मिला और बोला आजाओ मेरी गाड़ी में बैठ जाओ, मैं तुम्हें जहां जाना है -छोड़ देता हूँ , अब हम उसकी गाड़ी में बैठ गए पर सामान को सिर पर ही रखे रखा , मित्र ने कहा - अब गाड़ी में हो इसे उतार दो , तो हम कहने लगे कि तुमने हमें बैठा लिया इतना बहुत है , अब सर का भार आपकी गाड़ी पर नहीं डालूँगा .... सुन कर हँसी आ रही होगी , पर सच बताइये हम सब क्या कर रहे हैं  .... 

बस यही आनन्द  है    .... निर्भार , निर्वेर - मस्त उसके भरोसे।  हाँ जब जरूरत होगी तो लड़ोगे भी , कर्म से मुक्ति नहीं है - कर्म भाव से मुक्ति है। 


इसी लिए जन्माष्टमी को सभी गाते हैं - नन्द घर आनन्द  भयो जय कन्हैया लाल की 🙏

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books are suggested-


1- Srimad Bhagavatam -HINDI


2- Meiro Shree Krishna Leela Poorshottam Bhagwan

चिंतन और चिंता

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चिंतन और चिंता 

चिंतन वह जो आपको कोस्चन मार्क को हटा दे, चिंता वह जो कोस्चन मार्क में डाल दे 

चिंतन वह जिससे कुछ रास्ता निकले यानि यूजफुल और चिंता जिसका कोई यूज नहीं।  

एक वह जो शांत करे एंजाइटी को ख़त्म करे , और एक जो गुस्सा , परेशानी को भड़ा दे।  

एक वह है जो आपके आंतरिक विचारों पर काम करे और एक है जो बाहरी सोच तक सीमित होने से आपके आंतरिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं लाता है। 


एक जो आपके दिमाग पर काम करता है और एक आपके दिमाग से काम करता है।  

एक वह जिसकी सफलता आपके लिए जीवन सरल बनाता है और एक जिसकी सफलता आपको हर प्रकार से उलझाती है।    

अब दोनों को साथ - साथ  समझते हैं - 

* चिंता हमेशा भविष्य के बारे में होती है।  कुछ हमारी इच्छाएं हैं या मोह ( अटैचमेंट ) हैं जिसको न पाने या खोने का विचार हमें चिंता में ले जाता है।  

जैसे - मेरा व्यापार ख़त्म हो गया तो , हमारी गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया तो, मेरा इंटरव्यू सही नहीं हुआ तो - 

* अब यहां कुछ ऐसी स्थिति होती हैं - जिसमें हम कुछ कर सकते हैं और कुछ जिसमें हम कुछ नहीं कर सकते।  

   १- जैसे हमारा कोई व्यापार है उसको सुधारने की कोशिश कर सकते हैं।  

   २- किसी की मर्त्यु  की चिंता - उस विषय में हम कुछ नहीं कर सकते।  

१ - जिसके लिए हम कुछ कर सकते हैं - उसके लिए हम सोच रहे हैं यह क्या  अब क्या होगा हम क्या करेंगे मतलब - चिंता 

 लेकिन जब हम परिस्थिति से अपने को थोड़ा भिन्न करते हैं और अपने से कहें की अच्छा ये विषय है इसके विषय में हम क्या कर सकते हैं पूरा - पूरा समझें कि इस स्थिति में हम क्या कर सकते हैं-  यह चिंतन अगर हम ढंग से करेंगे तो हम वह रास्ता निकाल पाएंगे जो हमारे लिए सही होगा।  

अगर चिंता करते रहे तो हम कभी सही निर्णय नहीं ले पाएंगे जबकि चिंतन आपको सही स्थिति तक ले जायेगा। 

२ - मृत्यु - यह वह विषय है जो सनातन सत्य है और जिस विषय में आप कुछ भी कर नहीं सकते।  

      इस विषय में केवल हमारा अंतर्ज्ञान या हमारा इस विषय पर समझ ही हमें शांति दिला सकता है। 

किसी व्यक्ति के जाने से  जो कुछ हमसे अलग हुआ उसको हम मिस तो करते हैं लेकिन समझ हमें अंदर तक गहराई से शान्ति में ले जाती है जो वास्तविकता में है , अभी भी है बस उसे  समझ तक ले जाना है, शाब्दिक ज्ञान इकठ्ठा करने बात नहीं बनेगी।  

         जैसे अगर हम अपने को समझाएं कि यह ईश्वर की मर्जी है शायद मेरे कुछ कर्म हैं या कुछ भी तथाकथित बातें जो हमने सुन रखी हैं - शायद वह सुनने में पॉजिटिव लगे जैसे लोग आँख बंद करके मैडिटेशन करते हैं और सोचतें हैं कि ये विचार को न आने दें , आत्मा शांत हो रही है , आप एनलाइटेंड हो रहे हैं सभी कुछ पेन किलर है जैसे जिस चीज को भी हम रोकते हैं वह ज्यादा दिमाग में घूमती है,  इसी तरह किसी दोस्त के साथ समय बिताते हैं , कोई पसंद का काम करना ये सभी टेम्परेरी सोल्यूशन हैं।  

 दुनिया में कुछ भी नहीं मरता है जैसे जैसे बर्फ से पानी - पानी से भाप - भाप से पानी - पानी से बर्फ।  


जैसे ये शरीर ७०% पानी से बना है , वनस्पति ये सब से तो हम बने हैं मरते हैं अगर बॉडी को छोड़ दें तो अनंत अन्य शरीर बन जाते हैं , जला दें तो मिटटी बन जाते हैं , और फिर उससे बनस्पति आदि सब कुछ फिर बन जाता है।  

जैसे हम पहाड़ पर जाएँ वहां अकेले हैं तो मन लगाने को एक पुतला बनाया और सोचें कि यही मेरा लाइफपार्टनर है और उससे इतना प्यार हो जाये कि इसके बिना मेरी जिंदगी ही नहीं ,अब आप बताएं क्या यह व्यक्ति  इस चिंता से बाहर आ सकता है।  यह झूट की दुनिया किसने बनाई।  अब मजेदार  बात यह  है हम खुद उसी बर्फ के बने हैं और अब बताएं दो बर्फ के पुतले आपस में एक दूसरे को खोने की चिंता में रो रहे हैं और उससे जो गर्म सांसें और आंसूं निकल रहे हैं उससे पिघले जा रहे हैं।  दुनिया में कुछ भी ऐसा नहीं कि वह खो सके अगर ये बात पकड़ में आ जाये तो बात बन जाएगी वर्ना तो यह भी कोरा ज्ञान ही होगा।  

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books are suggested-

1-The Monk Who Sold His Ferrari 

रविवार, 9 अगस्त 2020

ध्यान का मूल मन्त्र

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ध्यान का मूल मन्त्र 🙏

ध्यान का मूल अर्थ है जागरूकता, अवेयरनेस, होश,   दृष्टा भाव और साक्ष‍ी भाव।

 ‘ ध्यान वह स्थिति है जो सहज घटता है।  

क्रिया के रूप में  -

तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम।। 3-2 ।।-योगसूत्र  

अर्थात- जहां चित्त को लगाया जाए उसी में वृत्ति का एकाकार होना  ध्यान है। 


धारणा का अर्थ चित्त को एक जगह लाना या ठहराना है, लेकिन ध्यान का अर्थ है जहां भी चित्त ठहरा हुआ है उसमें वृत्ति का एकाकार होना ध्यान है। उसमें जाग्रत रहना ध्यान है।

 ध्यान का अर्थ एकाग्रता नहीं होता। एकाग्रता टॉर्च की स्पॉट लाइट की तरह होती है जो किसी एक जगह पर ही प्रकाश देती  है, लेकिन ध्यान उस बल्ब की तरह है जिसका प्रकाश चारों दिशाओं में फैलाता है।  योगियों का ध्यान सूरज के प्रकाश की तरह होता है जिससे ब्रह्मांड की हर चीज पकड़ में आ जाती है।

ध्यान मात्र होना है, बिना कुछ किए - कोई कार्य नहीं, कोई विचार नहीं, कोई भाव नहीं।  बस होन, और यह एक कोरा आनंद है। जब आप  कुछ नहीं करते हैं तो यह आनंद कहां से आता है? यह  अस्तित्व आनंद नाम की वस्तु से बना है। इसे किसी कारण की आवश्यकता नहीं है। यदि आप  अप्रसन्न हैं तो आपके  पास अप्रसन्नता का कारण है- अगर आप  प्रसन्न हैं तो आप  बस प्रसन्न हैं  - इसके पीछे कोई कारण नहीं है। हमारा मन कारण खोजने की कोशिश करता है क्योंकि यह अकारण पर विश्वास नहीं कर सकता, क्योंकि यह अकारण को नियंत्रित नहीं कर सकता - जो अकारण है उससे दिमाग  निष्क्रिय  हो जाता है।और मन को हर समय कुछ चाहिए जिसे वह जानता हो पर ईश्वर या ध्यान तो अज्ञात हैं  लेकिनज ब भी हम आनंदित होते हैं, तो  किसी भी कारण से आनंदित नहीं होते, जब भी हम  अप्रसन्न होते हैं ,  तो हमारे पास अप्रसन्नता का कोई कारण होता है - क्योंकि आनंद ही वह चीज है जिससे हम  बने हैं । 


 बहुत से लोग क्रियाओं को ध्यान कहते  हैं- जैसे सहज योग ध्यान, भावातीत ध्यान और सुदर्शन क्रिया । दूसरी ओर विधि को भी ध्यान समझने की भूल की जा रही है।


बहुत से संत, गुरु या महात्मा ध्यान की तरह-तरह की  विधियां बताते हैं, लेकिन वे यह नहीं बताते हैं कि क्रिया और ध्यान में फर्क है। क्रिया तो साधन है साध्य नहीं। क्रिया तो औजार है।  विधि और ध्यान में फर्क है।

अगर वे  प्रामाणिक बने रहते और लोगों से कहते कि इससे एक बेहतर आरामदायक जीवन, मानसिक स्वास्थ्य, शारीरिक स्वास्थ्य,  और शांतिपूर्ण जीवन मिलेगा, तो यह सही होता। 

 किसी मूर्ति का स्मरण करना भी ध्यान नहीं है। अक्सर यह कहा जाता है कि पांच मिनट के लिए ईश्वर का ध्यान करो- यह भी ध्यान नहीं, स्मरण है।आंख बंद करके बैठ जाना भी ध्यान नहीं है।  

ध्यान  कई चरणों के बाद हो पाता है।  इन कई चरणों में पहले चक्रों को ठीक किया जाता है।   ध्यान की सिद्धि के बाद व्यक्ति अनंत सत्ता का अनुभव कर पाता है।  इसे समाधि कहा जाता है।  

पतंजलि ने अष्टांग योग - यम, नियम आसान , प्राणायाम , प्रत्याहार, धारणा , ध्यान , समाधी के बारे में बताया है।    

इसके अलावा जेन योगा में भी इसकी विस्तृत चर्चा है।   यहां कुंडलनी कैसे विकसित होती है , किस प्रकार आप ध्यान की स्थिति तक पहुँच सकते हैं , प्राण -अपान - व्यान आदि सारी योग व् ध्यान से जुडी विधियों को बहुत सूक्ष्म रूप से समझाया गया है।  


मेडिटेशन या ध्यान से आपका मानसिक व् शारीरिक स्वास्थ अच्छा होता है , क्रोध व् चिंता कम होती है , जीवन में ऊर्जा व् सभी के प्रति जागरूकता भड जाती है।  

ऐसे आध्यात्मिक ध्यान, केंद्रित ध्यान, विपस्ना , मन्त्र ध्यान आदि कई प्रकार से ध्यान किया जाता है , अगर आप किसी विशेष ध्यान के बारे में जानना चाहते हैं तो कृपया मुझे कमेंट करके अवश्य बतायेँ।   

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books are suggested-

1- Dhyan Ke Kamal (Hindi)


2-Yoga Sutras of Patanjali


3- Zen-Yoga: A Creative Psychotheraphy to Self-Integration

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अब जाग

    अब जाग   देह है जो 'दे' सबको, न कर मोह उसका, छोड़ना है एक दिन जिसको, झंझट हैं सब तर्क, उलझाने की विधियाँ हैं, ये कहा उसने, ये किय...